एक साधारण परंतु नवाचारी विचार ने यह सिद्ध कर दिया कि यदि छात्रों को किसी बड़े उद्देश्य से जोड़ा जाए, तो उनकी शैक्षणिक उपलब्धियों में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। हाल ही २०२४ में डिप्लोमा इंजीनियरिंग के छात्रों पर किए गए एक अध्ययन में यह स्पष्ट हुआ कि जब सफलता को सामाजिक योगदान से जोड़ा गया, तो परिणाम चौंकाने वाले थे।
इस प्रयोग में डिवीजन G और डिवीजन M, दोनों में 69-69 छात्र थे। दोनों को समान परिस्थितियों में पढ़ाया गया। किंतु डिवीजन G के छात्रों को एक विशेष चुनौती दी गई—यदि कोई छात्र परीक्षा में 30 में से पूरे 30 अंक लाता है, तो उसके नाम पर एक एनजीओ को ₹30 का दान दिया जाएगा। यह संस्था वंचित बच्चों को भोजन उपलब्ध कराती है। दूसरी ओर, डिवीजन M के छात्रों को इस पहल के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई।
परिणाम अत्यंत रोचक रहे। डिवीजन G के 22 छात्रों ने पूर्णांक प्राप्त किए, जबकि डिवीजन M के केवल 9 छात्रों ने ही पूरे अंक हासिल किए। यह और भी आश्चर्यजनक था क्योंकि डिवीजन G का औसत प्रदर्शन पहले डिवीजन M से कम रहा था।
इस पहल के बारे में बताते हुए संबंधित प्राध्यापक श्री. एस. आर. नदाफ ने कहा—“जब छात्रों ने अनुभव किया कि उनकी मेहनत का असर समाज पर भी पड़ रहा है, तो उनका उत्साह दोगुना हो गया। उन्हें केवल अंक प्राप्त करने का ही नहीं बल्कि समाज की भलाई में योगदान देने का भी उद्देश्य मिला।”
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की पहल अन्य संस्थानों में भी अपनाई जा सकती है। इससे न केवल शैक्षणिक प्रदर्शन सुधरेगा बल्कि छात्रों में सहानुभूति और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना भी विकसित होगी।
इस अध्ययन का निष्कर्ष है कि उद्देश्य आधारित प्रेरणा शिक्षा का एक सशक्त साधन बन सकती है, विशेषकर उन छात्रों के लिए जिन्हें पारंपरिक पुरस्कार प्रणालियाँ अधिक प्रभावित नहीं कर पातीं। शोधकर्ताओं का सुझाव है कि विभिन्न शैक्षणिक परिस्थितियों में ऐसे प्रयोग और किए जाने चाहिए ताकि इसके व्यापक परिणामों को समझा जा सके।
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